My Journey of Life
— अर्जुन पंचारिया सिंधु
मेरे लिए जीवन यात्रा का अर्थ केवल यह बताना नहीं है कि मैंने कब क्या किया। मेरे लिए मेरी यात्रा उन विचारों, अनुभवों और सीख का नाम है, जिन्होंने धीरे-धीरे मेरी सोच को बनाया है।
मैं अभी भी सीख रहा हूँ। अभी बहुत कुछ समझना बाकी है और बहुत कुछ करना बाकी है। इसलिए मैं अपनी कहानी को किसी उपलब्धि की कहानी के रूप में नहीं देखता। मैं इसे एक ऐसी यात्रा मानता हूँ जिसमें मैंने अपने आसपास की चीजों को देखा, उन पर विचार किया, कुछ सवाल खुद से पूछे और जहाँ तक संभव हुआ, अपने तरीके से कुछ उपयोगी करने की कोशिश की।
मेरी सोच की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदलता गया।
बचपन से चीजों को केवल मानना नहीं, समझने की कोशिश करना
बचपन से ही मेरी रुचि किसी बात को केवल सुनकर छोड़ देने में कम और उसके बारे में सोचने में ज्यादा रही है। मेरे मन में अक्सर सवाल आते थे कि कोई परंपरा क्यों है, किसी विचार के पीछे कारण क्या है और जो बात हम आज मान रहे हैं, उसका वास्तविक अर्थ क्या है।
धार्मिक विषयों में मेरी रुचि भी बचपन से रही है। धार्मिक स्थानों, धार्मिक इतिहास और उनसे जुड़े विचारों को जानना मुझे अच्छा लगता था।
लेकिन मेरे लिए धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा। मेरी रुचि उसके पीछे मौजूद विचारों और जीवन-दृष्टि को समझने में ज्यादा रही।
मैंने अलग-अलग धर्मों के बारे में सामान्य रूप से जानने का प्रयास किया, लेकिन स्वाभाविक रूप से मेरी रुचि हिंदू धर्म, उसकी परंपराओं और प्राचीन भारतीय विचारों को समझने में अधिक रही।
मैं जितना पढ़ता गया, उतना ही मुझे महसूस हुआ कि किसी भी विषय को सही ढंग से समझने के लिए केवल आज की स्थिति को देखना पर्याप्त नहीं है। उसके इतिहास और मूल विचारों तक जाना भी जरूरी है।
कक्षा 6 और भगवान परशुराम के जीवन को जानने की जिज्ञासा
मुझे आज भी याद है कि लगभग छठी कक्षा के समय मैंने भगवान परशुराम के जीवन के बारे में काफी रुचि से पढ़ना शुरू किया था।
उस उम्र में शायद मुझे हर बात की गहराई समझ नहीं आती होगी, लेकिन उन्हें जानने की जिज्ञासा बहुत थी। मैंने उनके जीवन, व्यक्तित्व और उनसे जुड़ी कथाओं को समझने का प्रयास किया।
मेरे लिए यह केवल धार्मिक अध्ययन नहीं था।
मुझे यह समझने में रुचि थी कि हमारे इतिहास और परंपराओं में जिन व्यक्तित्वों को आदर्श माना गया, उनके जीवन से वास्तव में क्या सीखा जा सकता है।
यहीं से शायद मेरे अंदर एक आदत और मजबूत हुई—किसी व्यक्ति या विचार को केवल नाम से जानने के बजाय उसके पीछे के अर्थ को समझने की कोशिश करना।
समय बीतने के बाद भी यह आदत मेरे साथ बनी रही।
धर्म, समाज और बदलते समय को साथ रखकर देखने की कोशिश
जैसे-जैसे मेरी समझ बढ़ी, मैंने धार्मिक और सामाजिक विचारों को वर्तमान समय से जोड़कर देखना शुरू किया।
मैंने मनुस्मृति के भी कुछ अंश और उससे जुड़े विचार पढ़े। उनमें से कुछ बातें मुझे विचार करने योग्य लगीं। साथ ही मैंने यह भी महसूस किया कि प्राचीन ग्रंथों, सामाजिक व्यवस्थाओं और आज की परिस्थितियों को समझते समय संदर्भ और समय का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है।
इन विषयों को पढ़ते हुए मेरे मन में समाज को लेकर कई सवाल पैदा हुए।
मेरी अपनी समझ में एक महत्वपूर्ण विचार यह रहा कि मनुष्य का मूल्य केवल उसके जन्म से तय नहीं होना चाहिए। उसके कर्म, योग्यता, व्यवहार और समाज के प्रति योगदान का भी महत्व होना चाहिए।
आज समाज में जन्म आधारित जातिगत पहचान बहुत मजबूत है। जब मैंने पुराने विचारों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को साथ रखकर सोचा, तो मुझे कई अंतर दिखाई दिए।
इसी तरह मुझे हमेशा यह बात महत्वपूर्ण लगी कि व्यक्ति को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार कार्य चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
आज कानूनी और सामाजिक रूप से हमारे पास बहुत सारे अवसर हैं, लेकिन कई बार हमारी सबसे बड़ी रुकावट बाहर नहीं बल्कि हमारे अपने मन में होती है।
“अगर मैं यह काम करूंगा तो लोग क्या कहेंगे?”
“लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”
“यह काम मेरे स्तर का लगेगा या नहीं?”
मैंने महसूस किया कि कई लोग अपनी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा इसी सोच में निकाल देते हैं।
मेरी अपनी सोच यह बनी कि यदि कोई काम सही है, सम्मानजनक है और उससे हम आगे बढ़ सकते हैं, तो केवल इस डर से उसे नहीं छोड़ना चाहिए कि दूसरे लोग क्या सोचेंगे।
दूसरों की राय सुनना गलत नहीं है, लेकिन अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की राय के अनुसार चलाना भी मुझे सही नहीं लगता।
कक्षा 11वीं–12वीं: सूचना और समाचारों की ओर बढ़ती रुचि
11वीं और 12वीं कक्षा के समय मेरी रुचि समाचारों और सूचनाओं में काफी बढ़ गई थी।
मुझे अच्छा लगता था कि मुझे कोई उपयोगी जानकारी मिले और मैं उसे दूसरे लोगों तक पहुँचाऊँ। धीरे-धीरे मेरे मन में यह भावना बनने लगी कि सही सूचना भी अपने आप में एक प्रकार की सहायता है।
बहुत बार लोगों को किसी अवसर का लाभ केवल इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि उन्हें समय पर जानकारी नहीं मिलती।
कहीं कोई फॉर्म निकलता है, कहीं शिक्षा से जुड़ी सूचना आती है, कहीं विद्यार्थियों के लिए कोई महत्वपूर्ण अपडेट होता है—लेकिन जानकारी सही व्यक्ति तक सही समय पर नहीं पहुँचती।
मुझे इसी चीज में रुचि आने लगी।
मैं समाचार केवल पढ़ना नहीं चाहता था। मैं यह समझना चाहता था कि सूचना कितनी सही है, उसका वास्तविक अर्थ क्या है और वह सामान्य व्यक्ति या विद्यार्थी के लिए कितनी उपयोगी है।
यहीं से मेरे अंदर लोगों तक जानकारी पहुँचाने और उन्हें जागरूक करने की इच्छा और मजबूत होती गई।
कॉलेज में प्रवेश और विद्यार्थी सहायता की शुरुआत
कॉलेज में आने के बाद मेरी जिंदगी का एक नया हिस्सा शुरू हुआ।
अब मुझे विद्यार्थियों को और करीब से समझने का अवसर मिला। उनकी पढ़ाई, परीक्षाओं, नोट्स, विश्वविद्यालय की सूचनाओं और दूसरी समस्याओं को देखने लगा।
इसी दौरान मैंने विद्यार्थी सहायता के क्षेत्र में काम करना शुरू किया।
शुरुआत बहुत छोटी थी।
उस समय न मेरे पास कोई बहुत बड़ा नेटवर्क था और न बहुत ज्यादा अनुभव। शुरुआत में बहुत कम विद्यार्थी मुझसे जुड़े थे। मैं भी काम करते-करते सीख रहा था कि विद्यार्थियों को वास्तव में किस प्रकार की जानकारी चाहिए और उनकी समस्याएँ क्या हैं।
मैंने नोट्स और शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने, विश्वविद्यालय से जुड़ी सूचनाएँ विद्यार्थियों तक पहुँचाने और जहाँ मेरी जानकारी काम आ सकती थी, वहाँ सहायता करने का प्रयास शुरू किया।
धीरे-धीरे विद्यार्थी जुड़ते गए।
एक विद्यार्थी से दूसरा, फिर दूसरे से तीसरा।
इस यात्रा में बहुत सारे लोगों का सहयोग और समर्थन भी रहा। इसलिए आज जो नेटवर्क बना है, उसका श्रेय केवल मैं खुद को नहीं दे सकता।
कॉलेज के अंतिम वर्ष तक आते-आते अलग-अलग माध्यमों से मेरा विद्यार्थी नेटवर्क लगभग 50,000 लोगों तक पहुँच गया।
लेकिन मेरे लिए संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण वह अनुभव था जो इतने विद्यार्थियों से जुड़ने के बाद मिला।
क्योंकि इसी दौरान मैंने विद्यार्थियों की समस्याओं को बहुत करीब से देखना शुरू किया।
विद्यार्थियों से जुड़कर एक कड़वी बात समझ आई
कॉलेज जीवन और विद्यार्थियों के साथ लगातार संपर्क में रहने के दौरान मैंने एक बात बहुत बार महसूस की।
यह बात शायद सुनने में अच्छी न लगे, लेकिन मेरी अपनी समझ में बेरोजगारी की समस्या को केवल नौकरी की कमी से समझना अधूरा है।
हम विद्यार्थियों को अपनी तरफ भी देखना होगा।
मैंने बहुत से विद्यार्थियों में देखा कि वे परिणाम तो अच्छा चाहते हैं, लेकिन नियमित पढ़ाई नहीं करना चाहते। रोजगार चाहते हैं, लेकिन किसी एक उपयोगी कौशल पर लगातार काम करने का धैर्य नहीं रखते।
मेहनत का परिणाम चाहिए, लेकिन मेहनत की प्रक्रिया कठिन लगती है।
मेरे लिए यह एक कड़वा सच है कि बिना मेहनत के लंबे समय तक कोई वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर बेरोजगार युवा मेहनत नहीं करता या रोजगार की समस्या केवल विद्यार्थी की गलती है। रोजगार के अवसर, आर्थिक परिस्थितियाँ, शिक्षा व्यवस्था और दूसरी सामाजिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन जिन चीजों को हम स्वयं बदल सकते हैं, उनकी जिम्मेदारी हमें स्वयं लेनी होगी।
यदि हमारे पास समय है और फिर भी हम सीख नहीं रहे, अपने कौशल पर काम नहीं कर रहे और केवल अवसर आने का इंतजार कर रहे हैं, तो हमें अपने तरीके पर भी विचार करना चाहिए।
“एक दिन पहले पढ़कर पास हो जाएंगे” वाली सोच
विद्यार्थियों के बीच काम करते हुए मैंने एक और चीज बहुत करीब से देखी।
कई विद्यार्थी पूरे सेमेस्टर पढ़ाई नहीं करते और परीक्षा से एक-दो दिन पहले कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न खोजते हैं। उद्देश्य केवल इतना होता है कि किसी तरह परीक्षा निकल जाए।
कभी-कभी इससे परीक्षा पास भी हो सकती है।
लेकिन मेरे मन में हमेशा यह सवाल रहता है—
उसके बाद क्या?
डिग्री मिल जाएगी, लेकिन ज्ञान कितना होगा?
यदि हमने तीन या चार वर्ष केवल परीक्षा पास करने में निकाल दिए और उस विषय को वास्तव में समझा ही नहीं, तो कॉलेज के बाद जब वास्तविक दुनिया में अपनी योग्यता साबित करने की बारी आएगी, तब मुश्किल होना स्वाभाविक है।
इसीलिए मैं विद्यार्थियों को हमेशा यह समझाना चाहता हूँ कि शॉर्ट नोट्स, महत्वपूर्ण प्रश्न और परीक्षा की रणनीति उपयोगी हैं, लेकिन उन्हें पूरी शिक्षा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
कम समय में परीक्षा की तैयारी अलग चीज है और वास्तव में शिक्षित होना अलग चीज।
डिग्री के साथ ज्ञान और Skill भी जरूरी है
मेरे अनुभव में केवल डिग्री आज पर्याप्त नहीं है।
एक विद्यार्थी के पास अपनी पढ़ाई का ज्ञान होने के साथ कम से कम एक ऐसी Skill जरूर होनी चाहिए जिससे वह अपनी उपयोगिता साबित कर सके।
वह तकनीकी कौशल हो सकता है, लेखन हो सकता है, डिजिटल काम हो सकता है, व्यवसाय की समझ हो सकती है, संचार क्षमता हो सकती है या किसी दूसरे क्षेत्र में विशेषज्ञता।
क्षेत्र कोई भी हो सकता है।
मुख्य बात है—एकाग्रता।
यदि हम हर दस दिन में अपना लक्ष्य बदलेंगे, तो किसी भी क्षेत्र में गहराई तक नहीं पहुँच पाएंगे।
लेकिन यदि एक क्षेत्र चुनकर लगातार सीखें, गलतियाँ करें, उन्हें सुधारें और फिर आगे बढ़ें, तो धीरे-धीरे परिणाम बनने लगते हैं।
मैंने अपनी छोटी-सी यात्रा में यही अनुभव किया है।
शुरुआत में मुझे भी सब कुछ नहीं आता था। काम करते-करते बहुत कुछ समझ में आया। आज भी सीखना जारी है और आगे भी रहेगा।
शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति और विचारों को जानना भी जरूरी
एक और कमी जो मुझे युवाओं के बीच महसूस हुई, वह अपनी संस्कृति, इतिहास और धार्मिक परंपराओं के बारे में बहुत कम जानकारी होना है।
मैं यह नहीं मानता कि हर व्यक्ति को हर धार्मिक ग्रंथ का विद्वान बनना चाहिए।
लेकिन जिस समाज, संस्कृति और परंपरा में हम बड़े हुए हैं, उसके मूल विचारों की सामान्य समझ तो होनी चाहिए।
साथ ही दूसरे विचारों और परंपराओं के प्रति सम्मान भी होना चाहिए।
किसी भी बात को बिना समझे मान लेना और बिना समझे उसका विरोध करना—मुझे दोनों ही तरीके सही नहीं लगते।
पढ़िए।
सवाल कीजिए।
अलग-अलग दृष्टिकोण समझिए।
फिर अपनी समझ बनाइए।
मेरी कोशिश भी यही रही है।
समाज को समझना भी मेरी यात्रा का हिस्सा बना
समय के साथ विद्यार्थी सहायता के साथ-साथ समाज को समझने में भी मेरी रुचि बढ़ती गई।
जब आप अलग-अलग लोगों से मिलते हैं तो आपको किताबों से अलग एक दुनिया दिखाई देती है।
लोगों की समस्याएँ अलग हैं, सोच अलग है, परिस्थितियाँ अलग हैं और प्राथमिकताएँ भी अलग हैं।
मैंने महसूस किया कि समाज में केवल कमियाँ गिनाना आसान है, लेकिन उन कमियों के कारण समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
यदि समाज में एकता चाहिए तो केवल मंच से “एक रहो” कह देने से एकता नहीं आएगी। लोगों के बीच संवाद, विश्वास और आपसी सम्मान भी होना चाहिए।
समाज में बदलाव के लिए पहले समाज को समझना पड़ता है।
और शायद उससे भी पहले स्वयं को समझना पड़ता है।
भगवान परशुराम के विचारों से समाज सेवा की ओर
बचपन में भगवान परशुराम के जीवन के बारे में जो रुचि शुरू हुई थी, समय के साथ उसका स्वरूप भी बदलता गया।
बाद में मैंने परशुराम सेना से जुड़कर अपने तरीके से समाज में योगदान देना शुरू किया।
मेरे लिए किसी सामाजिक संगठन से जुड़ने का उद्देश्य केवल पद या पहचान नहीं होना चाहिए। यदि समाज के बीच काम कर रहे हैं तो समाज की वास्तविक समस्याओं को समझना और जितना संभव हो उनके समाधान की दिशा में प्रयास करना अधिक महत्वपूर्ण है।
मैं आज भी समाज को समझने का प्रयास कर रहा हूँ।
क्योंकि जितने अधिक लोगों से मिलता हूँ, उतना ही महसूस होता है कि समाज को समझना अपने आप में एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
मैंने अब तक अपनी यात्रा से क्या सीखा?
मेरी जिंदगी अभी बहुत लंबी यात्रा की शुरुआत में है। इसलिए मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैंने जीवन को पूरी तरह समझ लिया है।
लेकिन अब तक के अनुभवों से कुछ बातें मेरे अंदर मजबूत हुई हैं।
मेहनत का कोई वास्तविक विकल्प नहीं है।
ज्ञान केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं होना चाहिए।
डिग्री के साथ Skill जरूरी है।
अपनी संस्कृति को जानना चाहिए, लेकिन दूसरे विचारों को समझने का मन भी खुला होना चाहिए।
समाज को बदलने की बात करने से पहले समाज को समझना जरूरी है।
और सबसे महत्वपूर्ण—
“लोग क्या कहेंगे” के डर से अपनी क्षमता को रोकना नहीं चाहिए।
यदि काम सही है, नीयत सही है और हम सीखने के लिए तैयार हैं, तो शुरुआत छोटी होने में कोई समस्या नहीं है।
मेरी अपनी शुरुआत भी छोटी थी।
आज मैं कहाँ खड़ा हूँ?
आज भी मैं खुद को किसी मंजिल पर पहुँचा हुआ व्यक्ति नहीं मानता।
विद्यार्थियों के साथ काम करते हुए शिक्षा को और समझ रहा हूँ। समाज के बीच रहते हुए समाज को समझ रहा हूँ। अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों को पढ़ते हुए अपनी समझ को बेहतर करने की कोशिश कर रहा हूँ।
कई बार मेरी पुरानी सोच बदलती भी है।
और मुझे इसमें कोई समस्या नहीं लगती।
क्योंकि यदि नई और सही जानकारी मिलने के बाद भी इंसान अपनी पुरानी बात केवल इसलिए पकड़े रहे कि उसने कभी वही कहा था, तो फिर सीखने का अर्थ ही क्या रह जाता है?
मेरे लिए सीखना एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
मेरी मंजिल से ज्यादा महत्वपूर्ण मेरा रास्ता है
मुझे नहीं पता कि आने वाले वर्षों में मेरी यात्रा मुझे कहाँ लेकर जाएगी।
लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूँ कि जो भी करूँ, उससे किसी न किसी रूप में उपयोगिता पैदा हो।
अगर कोई विद्यार्थी मेरी दी हुई जानकारी से समय पर अपना काम कर पाता है, कोई युवा मेरी बात पढ़कर अपने समय और भविष्य को लेकर गंभीर होता है, कोई व्यक्ति अपनी क्षमता को केवल “लोग क्या कहेंगे” के डर से रोकना छोड़ देता है, या कोई युवा अपने इतिहास और संस्कृति को स्वयं पढ़ने की शुरुआत करता है—तो मुझे लगता है कि मेरे विचार लिखने का उद्देश्य पूरा हो रहा है।
मैं दूसरों को यह नहीं बताना चाहता कि उन्हें बिल्कुल मेरी तरह सोचना चाहिए।
मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ—
खुद पढ़िए।
खुद समझिए।
खुद सवाल कीजिए।
अपनी गलतियों को स्वीकार कीजिए।
एक क्षेत्र चुनकर ईमानदारी से मेहनत कीजिए।
और अपनी जिंदगी का फैसला केवल इस आधार पर मत कीजिए कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे।
आज मैं जो कुछ समझ पाया हूँ, वह किताबों, अनुभवों, विद्यार्थियों से हुई बातचीत, समाज के अलग-अलग लोगों से मिलने और अपनी गलतियों से सीखने का परिणाम है।
आगे मेरी सोच और बेहतर हो सकती है। कई विचार बदल भी सकते हैं। क्योंकि मेरे लिए किसी विचार को पकड़कर बैठ जाना महत्वपूर्ण नहीं है—सही बात को समझते रहना महत्वपूर्ण है।
मेरी यात्रा अभी जारी है।
शायद यही मेरी जीवन यात्रा की सबसे सच्ची पंक्ति है—
“मैं अभी बना नहीं हूँ, मैं अभी बन रहा हूँ।”
— अर्जुन पंचारिया सिंधु।
