UGC rollback : आज आप सवाल नहीं पूछोगे तो कल कॉलेज में पढ़ने वाला आपका बेटा आपसे सवाल पूछेगा, पापा जब कानून बन रहा था तो आप क्या कर रहे थे ।

कुर्सी आज है, कल नहीं—पार्टी के लिए समाज और बच्चों का भविष्य मत भूल जाना
आज मन में एक बात है, सोचा खुलकर लिख ही दूँ। हो सकता है कुछ लोगों को मेरी बात अच्छी लगे, कुछ को कड़वी लगे और कुछ लोग मुझसे सहमत ही ना हों। लेकिन हर बात यह सोचकर नहीं रोकी जा सकती कि कौन नाराज होगा और कौन खुश होगा।
आज बीकानेर, नोखा और आसपास के इलाकों में नगर निगम, नगर पालिका और पार्षद चुनावों का माहौल है। हमारे ब्राह्मण और दूसरे स्वर्ण समाज के बहुत से युवा नेता भी राजनीति में सक्रिय हैं। कोई भाजपा से चुनाव लड़ रहा है, कोई कांग्रेस से, कोई दूसरी विचारधारा से जुड़ा है। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है। राजनीति करो, चुनाव लड़ो, पार्षद बनो, विधायक बनो, मंत्री बनो—समाज का युवा आगे बढ़े, इससे अच्छी बात क्या होगी?
पण म्हारो सवाल राजनीति में जाण सूं कोनी, राजनीति में जाकर आपणा लोगां नै भूल जाण सूं है।
आज UGC को लेकर जो विरोध और Roll Back की मांग चल रही है, या SC/ST कानून के दुरुपयोग को लेकर स्वर्ण समाज के भीतर जो सवाल उठते रहे हैं—इन विषयों पर हमारे अपने कितने राजनीतिक नेता खुलकर बोल रहे हैं?
बस यहीं से मेरी बात शुरू होती है।
1. आज सीट आपकी है, कल किसी और की होगी—पण समाज तो आपणा ही रहसी
सबसे पहले राजनीति करने वाले अपने युवा साथियों से एक बात कहना चाहता हूँ।
आज आपके पास पार्षद की सीट हो सकती है। कल विधायक की टिकट मिल सकती है। परसों पार्टी कोई बड़ा पद दे सकती है। अच्छी बात है। खूब आगे बढ़ो।
लेकिन राजनीति का एक नियम हमेशा याद रखना—
कुर्सी किसी की सगी नहीं होती।
आज भाजपा सत्ता में है, कल कांग्रेस हो सकती है। फिर कोई और पार्टी आ सकती है। आज जो नेता मंच के बीच में बैठा है, कुछ साल बाद वही भीड़ में बैठा दिखाई दे सकता है।
नगर निगम का चुनाव फिर आएगा, नगर पालिका का चुनाव फिर आएगा, विधानसभा और लोकसभा चुनाव भी आते-जाते रहेंगे।
पार्टियां बदलती रहसी, सरकार बदलती रहसी, नेता बदलता रहसी और कुर्सी भी बदलती रहसी। पण आपणा समाज और आपणा बालक आपणा ही रहसी।
इसलिए मेरी परेशानी यह नहीं है कि हमारे समाज का व्यक्ति भाजपा में क्यों है या कांग्रेस में क्यों है।
मेरी परेशानी तब है जब कोई व्यक्ति पार्टी में जाकर पार्टी को समाज से इतना ऊपर रख देता है कि समाज की आवाज सुनाई देनी ही बंद हो जाती है।
आज टिकट मिल गया तो समाज पीछे?
आज पद मिल गया तो समाज पीछे?
आज अपनी सरकार आ गई तो सवाल पूछना बंद?
भाई, फिर समाज की याद कब आएगी?
अगले चुनाव में वोट चाहिए होंगे तब?
2. UGC हो या झूठे मामलों का डर—अपणा नेता ही नहीं बोलसी तो फेर बोलसी कुण?
आज UGC के मुद्दे को लेकर स्वर्ण समाज के अनेक युवा Roll Back की मांग कर रहे हैं। इसी तरह SC/ST कानून के दुरुपयोग और झूठे मामलों को लेकर भी हमारे समाज में लंबे समय से चिंता और सवाल हैं।
मैं एक बात बिल्कुल साफ कहना चाहता हूँ—किसी SC/ST व्यक्ति के साथ वास्तव में अत्याचार हुआ है तो उसे पूरा न्याय मिलना चाहिए और दोषी को सजा भी मिलनी चाहिए।
पण झूठो मामला किसी पर भी होवै, वो गलत ही है।
वह ब्राह्मण पर हो, राजपूत पर हो, SC पर हो, ST पर हो या किसी और समाज के व्यक्ति पर—निर्दोष आदमी को केवल इसलिए परेशानी क्यों उठानी पड़े कि कानून का गलत इस्तेमाल हुआ?
मेरा सवाल किसी समाज का अधिकार खत्म करने का नहीं है। मेरा सवाल बराबरी का है।
जिसके साथ अन्याय हुआ है उसे न्याय दो, लेकिन जिस पर झूठा आरोप लगा है उसकी सुरक्षा भी तो होनी चाहिए।
अब मेरा सवाल अपने नेताओं से है—
अगर यह बात भी हमारे समाज से चुनाव जीतकर गया व्यक्ति नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा?
क्या पार्टी में जाते ही मुंह पर ताला लग जाता है?
क्या अपनी सरकार से सवाल पूछना पार्टी छोड़ना हो गया?
आपको पार्टी ने टिकट दिया है, ठीक है। लेकिन वोट किसने दिया?
जनता ने।
आज आप समाज के बीच से निकलकर ऊपर पहुंचे हो और वहीं जाकर समाज की आवाज सुनना बंद कर दोगे तो यह बात मुझे समझ नहीं आती।
म्हारै हिसाब सूं नेता वो कोनी जिको ऊपर वाला नेता बोले अर बस “हाँ साहब, हाँ साहब” करै। नेता वो है जिको जरूरत पड़ै तो आपणी सरकार नै भी कह सके—“साहब, एक बार म्हारा लोगां री बात भी सुणो।”
3. आज आप चुप रहोगे, कल आपका बच्चा पूछेगा—“पापा, उस समय आप क्या कर रहे थे?”
मेरे मन में सबसे बड़ी बात यही है।
आज का चुनाव चला जाएगा। आज का विरोध भी कुछ समय बाद शांत हो जाएगा। सोशल मीडिया पर दो-चार दिन चर्चा होगी, फिर कोई नया मुद्दा आ जाएगा।
लेकिन जो फैसले आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर असर डालते हैं, उनका प्रभाव बहुत लंबे समय तक रह सकता है।
और इसलिए मुझे आज से ज्यादा उस दिन की चिंता है जब हमारे बच्चे बड़े होंगे।
सोचिए।
आज आपके पास पद है।
सरकार में आपकी पहचान है।
बड़े नेताओं के साथ उठना-बैठना है।
आप रोड शो में आगे चल रहे हो।
आपके पास मंच है।
और आपका समाज किसी मुद्दे पर आवाज उठा रहा है।
लेकिन आप केवल इसलिए चुप हो कि “अपणी सरकार है, बोलणो ठीक कोनी।”
ठीक है।
आज कोई आपको कुछ नहीं कहेगा।
लेकिन 15–20 साल बाद आपका अपना बेटा आपसे पूछ सकता है—
“पापा, जब ये कानून और नियम बन रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे?”
आप क्या जवाब दोगे?
“बेटा, उस समय मेरी पार्टी की सरकार थी इसलिए मैं नहीं बोला।”
वह बच्चा अगला सवाल करेगा—
“सरकार आपकी थी, इसलिए तो आपकी बात ज्यादा सुनी जाती; फिर आप बोले क्यों नहीं?”
उस समय क्या जवाब होगा?
यही बात मेरे मन में सबसे ज्यादा घूमती है।
कल कोई दूसरा आदमी आकर यह नहीं कहेगा कि तुम्हारा बाप निकम्मा था।
पण आपणा बालक ही पूछ बैठ्यो कि “म्हारा पापा रै हाथ में मौका होतो, फेर भी वो पार्टी रै पाछै चलतां-चलतां आपणा समाज नै भूल गया”—तो इण बात रो जवाब आपणै ही देवणो पड़सी।
पार्टी जवाब देने नहीं आएगी।
नेता जवाब देने नहीं आएगा।
जवाब आपको देना पड़ेगा।
4. भजनलाल जी, रोड शो में आवाज उठी थी—क्या वह आपके कानों तक नहीं पहुँची?
अब मैं राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी से भी सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ।
यह व्यक्तिगत विरोध नहीं है।
बल्कि सवाल इसलिए ज्यादा है क्योंकि आप स्वयं ब्राह्मण यानी स्वर्ण समाज की पृष्ठभूमि से आते हैं और स्वाभाविक रूप से समाज के युवाओं को आपसे उम्मीद भी ज्यादा रहती है।
नगर निकाय चुनाव के दौरान आपके रोड शो में स्वर्ण समाज के अनेक सक्रिय युवाओं और संगठनों ने UGC Roll Back के नारे लगाए। युवाओं ने अपनी बात आप तक पहुंचाने की कोशिश की।
लेकिन जिस तरह उनकी आवाज अनसुनी होती दिखाई दी, उससे मेरे मन में एक ही सवाल आया—
मुख्यमंत्री जी, क्या वह आवाज आपके कानों तक पहुँची ही नहीं?
अगर पहुंची थी तो एक बार रुककर पूछ लेते—
“भाई, समस्या क्या है?”
आपको वहीं फैसला नहीं करना था।
आपको रोड शो रोककर पूरा कानून नहीं बदलना था।
आप पांच लोगों को बुलाकर इतना कह सकते थे—
“आपकी बात मेरे तक पहुंच गई है, प्रतिनिधिमंडल लेकर जयपुर आइए, बैठकर बात करेंगे।”
इतना कहने में क्या जाता?
उल्टा युवाओं को लगता कि मुख्यमंत्री ने कम से कम हमारी बात सुनी।
यहीं मैं पूछना चाहता हूँ—
सत्ता मिलने के बाद क्या केवल सत्ता का मोह रह जाता है?
अगला चुनाव कैसे जीतेंगे?
कौन सा वोट बैंक नाराज होगा?
किसको खुश रखना है?
किस मुद्दे पर बोलने से कितनी सीट जाएगी?
अगर हर फैसला इसी तराजू में तौला जाएगा तो फिर समाज, समानता और देश की बात कब होगी?
म्हारो सवाल सीधो है—सत्ता जनता वास्ते है या जनता केवल सत्ता हासिल करण वास्ते?
5. मुख्यमंत्री पूरे राजस्थान का है—तो स्वर्ण समाज की आवाज सुनना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है
यहां कोई मेरी बात का यह मतलब ना निकाले कि मुख्यमंत्री ब्राह्मण हैं तो केवल ब्राह्मणों का काम करें।
बिल्कुल नहीं।
मुख्यमंत्री पूरे राजस्थान का है।
SC का भी।
ST का भी।
OBC का भी।
ब्राह्मण का भी।
राजपूत का भी।
वैश्य का भी।
हर गरीब, किसान, विद्यार्थी और सामान्य परिवार का भी।
यही तो मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी है।
लेकिन पूरे राजस्थान का मुख्यमंत्री होने का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि जिस समाज से आप आते हैं, उसकी समस्या सुनना ही गलत समझ लिया जाए।
SC समाज प्रतिनिधिमंडल लेकर आए—सुनिए।
ST आए—सुनिए।
OBC आए—सुनिए।
किसान आए—सुनिए।
बेरोजगार युवा आए—सुनिए।
और स्वर्ण समाज के युवा आएं तो उनकी भी सुनिए।
इण में पक्षपात कठै है? ई तो बराबरी है सा।
मेरी मांग किसी को नीचे करने की नहीं है।
मैं नहीं चाहता कि किसी समाज का अधिकार छीना जाए।
लेकिन मैं यह भी नहीं चाहता कि वोट बैंक की राजनीति में किसी दूसरे समाज की आवाज इतनी हल्की मान ली जाए कि उसे सुनने की जरूरत ही महसूस ना हो।
सरकार का काम हर समाज को साथ लेकर चलना है।
6. चुनाव में वोट चाहिए तो “अपणा समाज”, और सवाल करे तो “राजनीति मत करो”?
यही बात सबसे ज्यादा चुभती है।
चुनाव आएगा तो समाज याद आएगा।
सम्मेलन होंगे।
मंच लगेगा।
माला पहनी जाएगी।
कहा जाएगा—
“ब्राह्मण समाज हमारे साथ है।”
“स्वर्ण समाज का आशीर्वाद चाहिए।”
समाज के बुजुर्गों के पैर छुए जाएंगे।
युवाओं को फोन आएंगे—
“भाई, इस बार साथ देना।”
तब समाज बहुत अपना लगता है।
लेकिन वही युवा चुनाव के बाद किसी मुद्दे को लेकर आपके सामने आ जाए और कहे कि हमारी बात सरकार तक पहुंचाओ, तो उसे कहा जाता है—
“अभी माहौल ठीक नहीं है।”
“पार्टी का मामला है।”
“ऊपर से फैसला है।”
तो भाई, वोट लेवण टाइम समाज आपणा अर समाज सवाल पूछै तो परायो? ई हिसाब म्हारै समझ में तो कोनी आवै।
समाज केवल वोट देने के लिए नहीं है।
उसके बच्चे हैं।
उनके भविष्य हैं।
उनकी समस्याएं हैं।
उनकी अपेक्षाएं हैं।
अगर आपने समाज के नाम पर वोट मांगा है तो समाज को आपसे सवाल पूछने का भी उतना ही अधिकार है।
और यह बात भाजपा, कांग्रेस दोनों पर बराबर लागू होती है।
आज राजस्थान में भाजपा की सरकार है इसलिए सवाल भाजपा से ज्यादा है।
कल कांग्रेस सत्ता में होगी तो यही सवाल कांग्रेस से होगा।
म्हारा सवाल रै ऊपर किसी पार्टी रो झंडो कोनी लाग्यो है।
जो सही करेगा उसकी तारीफ होगी।
जो गलत लगेगा उससे सवाल होगा।
बस इतनी सी बात है।
7. राजनीति करो, बड़े पद तक जाओ—पण रीढ़ और आपणा लोग मत भूल जाना
मैं अपने समाज के युवाओं को राजनीति छोड़ने की बात बिल्कुल नहीं कह रहा।
उल्टा मैं चाहता हूँ कि बीकानेर का युवा आगे जाए।
जयपुर तक जाए।
दिल्ली तक जाए।
पार्षद बने।
विधायक बने।
सांसद बने।
मंत्री बने।
मुख्यमंत्री बने।
जितना आगे जा सकता है जाए।
लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—
पद मिल जाए और बोलने की हिम्मत चली जाए तो उस पद का फायदा क्या?
अगर अपनी पार्टी की बैठक में आप अपने समाज की जायज समस्या नहीं रख सकते तो समाज ने आपको ऊपर भेजकर पाया क्या?
पार्टी के प्रति निष्ठा रखो।
लेकिन इतनी निष्ठा मत रखो कि सही और गलत का फर्क ही खत्म हो जाए।
आज भाजपा गलत करेगी तो भाजपा से सवाल करो।
कांग्रेस गलत करेगी तो कांग्रेस से सवाल करो।
कल मेरी पसंद का नेता भी गलत करेगा तो उससे भी सवाल होना चाहिए।
यही लोकतंत्र है।
और अपने समाज के लोगों से भी एक बात—
किसी नेता को केवल इसलिए भगवान मत बना दो क्योंकि वह अपनी जाति का है।
उससे सवाल पूछो।
उसका काम देखो।
जब समाज को जरूरत थी तब वह कहाँ था—यह भी याद रखो।
आपणो नेता है तो सवाल भी आपणो समझ कै पूछो। सवाल पूछणो विरोध कोनी होवै।
और हाँ, पार्टी के कारण आपस में मत टूट जाना।
आज एक भाजपा में है, एक कांग्रेस में है, एक किसी दूसरी पार्टी में।
कोई दिक्कत नहीं।
राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं।
लेकिन चुनाव पांच साल का है।
समाज पीढ़ियों का है।
पार्टी के लिए इतना मत लड़ो कि कल समाज के मुद्दे पर एक साथ बैठ भी ना सको।
8. आखिरी बात—पार्टी बदल जाएगी, कुर्सी चली जाएगी; कल जवाब अपने बच्चों को देना है
इस पूरी बात को अगर दो लाइन में समझना हो तो मेरी बात बस इतनी है—
मैं किसी दूसरे समाज का अधिकार नहीं छीनना चाहता।
मैं अपने समाज की आवाज दबने भी नहीं देना चाहता।
किसी SC/ST व्यक्ति के साथ वास्तव में अन्याय हुआ है तो उसे न्याय मिले, दोषी को सजा मिले। लेकिन अगर किसी निर्दोष पर झूठा मामला होता है तो उसके लिए भी कानून में न्याय होना चाहिए।
आपणो हक मांगणो, दूजा रो हक छीनणो कोनी होवै।
मैं किसी जाति से लड़ाई नहीं चाहता।
मैं बराबरी चाहता हूँ।
और सबसे ज्यादा मैं चाहता हूँ कि हमारा युवा किसी राजनीतिक पार्टी का इतना अंध समर्थक ना बन जाए कि अपनी ही आंखों के सामने हो रही बात पर सवाल करना भूल जाए।
अब जो यह लेख पढ़ रहे हैं उनसे मेरा आखिरी सवाल है।
थोड़ी देर के लिए भाजपा-कांग्रेस भूल जाइए।
मान लीजिए आप खुद किसी बड़े राजनीतिक पद पर बैठे हैं।
आपकी सरकार है।
आपके समाज के हजारों युवा आपके सामने खड़े हैं।
वे कह रहे हैं कि हमारी बात सुनो।
आप क्या करोगे?
पार्टी की तरफ देखोगे?
कुर्सी की तरफ देखोगे?
या उन युवाओं की तरफ?
और अगर कल आपका बेटा आपसे पूछे—
“पापा, जब आपके पास बोलने का मौका था तब आप क्यों नहीं बोले?”
तो क्या आपके पास जवाब होगा?
यही सवाल मैं आज खुद से भी पूछ रहा हूँ और आपसे भी।
म्हैं तो इतणो ही कहूं—राजनीति खूब करो, आगे बढ़ो, पद लो, सत्ता में जाओ; पण इतनी राजनीति मत करो कि आपणा लोगां री आवाज ही सुनाई देणी बंद हो जावै।
देश सबसे पहले होना चाहिए।
देश के अंदर हर समाज को सम्मान और बराबरी मिलनी चाहिए।
अपने समाज की जायज बात रखना किसी दूसरे समाज का विरोध नहीं है।
और सरकार अपनी हो या दूसरी—
सवाल पूछना बंद मत करो।
क्योंकि आज हम सवाल नहीं पूछेंगे तो कल हमारे बच्चे हमसे सवाल जरूर पूछेंगे।
और उस दिन जवाब भाजपा नहीं देगी।
कांग्रेस नहीं देगी।
कोई मुख्यमंत्री नहीं देगा।
कोई पार्टी नहीं देगी।
जवाब आपणै देवणो पड़सी।
कुर्सी चली जाएगी।
चुनाव फिर आ जाएगा।
पार्टी भी बदल सकती है।
लेकिन आने वाली पीढ़ी के सामने हमारा सिर झुके या ऊंचा रहे—यह फैसला आज हमारे हाथ में है।
Disclaimer
इस लेख में मैंने केवल अपने व्यक्तिगत विचार और अपने मन की भावनाएँ खुलकर व्यक्त की हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, जाति, समाज, वर्ग, संगठन, राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। UGC, SC/ST कानून, सरकार, मुख्यमंत्री अथवा अन्य राजनीतिक विषयों को लेकर लिखी गई बातें मेरे व्यक्तिगत विचार, सवाल और चिंताएँ हैं। मेरा उद्देश्य किसी समाज के प्रति नफरत पैदा करना अथवा किसी के अधिकारों का विरोध करना नहीं है। यदि मेरे किसी शब्द, वाक्य या विचार से किसी व्यक्ति अथवा समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचती है तो मैं उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
